डिस्पोजेबल के बजाय स्टील के बर्तनों का चयन क्यों?

सनातन परंपरा में दान और भंडारे का विशेष महत्व है। अक्सर हम अपनी श्रद्धा के अनुसार आयोजन तो करते हैं, लेकिन अनजाने में कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं जो प्रकृति और ज्योतिषीय ऊर्जा के विरुद्ध होती हैं।

वर्तमान समय में प्लास्टिक और थर्माकोल का बढ़ता उपयोग हमारे पुण्य कर्मों के प्रभाव को कम कर रहा है।

  1. मंगल और स्वच्छता का गहरा नाता ​ज्योतिष शास्त्र में मंगल को ‘धातु’ का स्वामी माना गया है। मंगल की शुद्ध ऊर्जा ‘स्वच्छता’ और ‘अनुशासन’ में निहित है। इसके विपरीत, गंदगी और कचरा राहु का कारक है। ​प्लास्टिक या थर्माकोल का कचरा फैलाना राहु के नकारात्मक प्रभाव को बढ़ाता है। ​स्टील (धातु) के बर्तनों का उपयोग स्वच्छता को बढ़ावा देता है, जिससे मंगल की शुभता बढ़ती है। हनुमान जी, जो मंगल के अधिष्ठाता देव हैं, उन्हें स्वच्छता अत्यंत प्रिय है।
  2. भूमि पुत्र मंगल और पर्यावरण संरक्षण ​मंगल को ‘भूमि पुत्र’ कहा जाता है। प्लास्टिक और थर्माकोल कभी नष्ट नहीं होते और पृथ्वी को गहराई तक प्रदूषित करते हैं। ​जब हम धरती माँ को गंदा करते हैं, तो हम अनजाने में ‘भूमि पुत्र’ मंगल को रुष्ट करते हैं।​ पृथ्वी की रक्षा करना और उसे कचरा मुक्त रखना ही मंगल की सच्ची आराधना है
  3. शनि और मंगल का अद्भुत समन्वय​शास्त्रों के अनुसार, शनि देव हनुमान जी का परम सम्मान करते हैं। जब हम हनुमान जी के भंडारे या किसी भी धार्मिक आयोजन में स्टील के बर्तनों का उपयोग करते हैं, तो ​मंगल (धातु) और शनि (सेवा और स्थायित्व) दोनों ग्रहों को शुभता प्राप्त होती है।​यह समन्वय व्यक्ति और समाज के जीवन में स्थिरता और अनुशासन लेकर आता है।
  4. ‘अक्षय दान’ की महिमा​भंडारे में भोजन कराना एक दिन का पुण्य है, लेकिन किसी मंदिर या संस्था के ‘बर्तन बैंक’ के लिए स्टील की प्लेटें, गिलास या चम्मच दान करना ‘अक्षय दान’ की श्रेणी में आता है।​एक बार दिया गया यह दान वर्षों तक हजारों लोगों की सेवा में काम आता है। जितनी बार उन बर्तनों का उपयोग होगा, दानदाता को उसके पुण्य का ‘अक्षय फल’ निरंतर मिलता रहेगा।

अगली बार जब आप भंडारे या सामूहिक भोज का संकल्प लें, तो केवल पेट भरने का नहीं, बल्कि प्रकृति को सुरक्षित रखने का भी संकल्प लें। ‘प्लास्टिक मुक्त भंडारा’ ही हमारे देवी-देवताओं और इस पृथ्वी के प्रति सच्ची सेवा है। यही मंगलमान है।

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